J. Krishnamurti's Teachings Online in Indian Languages (Hindi, Punjabi, Gujarati, Marathi, Bengali etc.)







Question: How can we be free from indignation?


Krishnamurti: What do you mean by indignation? You mean when a man beats a heavily laden donkey, you feel angry? You say you feel righteously angry when some big man beats a little boy. Is there such a thing as righteous indignation?

प्रश्न : रोष से मुक्त होने का क्या तरीका है?


कृष्णमूर्ति : रोष से आपका आशय क्या है? क्या आपका आशय यह है कि जब कोई आदमी भारी बोझ से लदे गधे को पीटता है तो उसे देखकर आपको गुस्सा आता है? आप कहते हैं कि जब कोई बड़ा आदमी किसी छोटे से बच्चे को पीटता है तो आपको गुस्सा आना उचित है | क्या उचित क्रोध जैसी कोई चीज़ वास्तव में होती है?

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सर, आप वैज्ञानिक हैं


कृष्णमूर्ति : सर, आप वैज्ञानिक हैं, आपने परमाणु इत्यादि का निरीक्षण किया है | इस सारे निरीक्षण के उपरांत क्या आप यह महसूस नहीं करते कि इस सबके परे बहुत कुछ और भी है?
डेविड बोम : हमेशा यह महसूस होता है कि इसके पार कुछ और है, पर इससे यह पता नहीं चलता कि यह क्या है? यह तो सपष्ट है ही कि जो कुछ भी मनुष्य जानता है, सीमित है।
कृष्णमूर्ति : हां।

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मन का कार्य विचार करना है |


प्रश्न: मन का कार्य विचार करना है | मैंने कई वर्ष उन चीज़ों के बारे में सोचते हुए बिताए हैं जिन्हें हम सब जानते हैं – व्यापार, विज्ञान, दर्शन, मनोविज्ञान, कलाएं आदि – तथा अब मैं ईश्वर के बारे में काफी कुछ विचार करता हूं | अनेक रहस्यदर्शियों तथा धार्मिक ग्रंथकारों द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों का अध्ययन करने से मैं कायल हो गया हूं कि ईश्वर है, तथा मैं इस विषय में अपने विचारों का योगदान दे सकता हूं | इसमें गलत क्या है? क्या ईश्वर के बारे में विचार करने से ईश्वर के साक्षात्कार में सहायता नहीं मिलती है?

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Question: A gentleman asks how far do you agree with Shankara who says, ‘Eliminate the mind completely’?


Krishnamurti: Not having read Shankara, I cannot answer. But I think it is very important to find out for ourselves and not repeat Shankara or Buddha. The difficulty with most of us is that we have read, we know what other people have said, but we do not know at all what we ourselves think.

प्रश्न : एक महानुभाव पूछते हैं – शंकर के इस कथन से आप कितना सहमत हैं कि मन को पूर्ण रूप से मिटा दिया ..


कृष्णमूर्ति: चूंकि मैंने शंकर को नहीं पढ़ा है इसलिए इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए संभव नहीं है | परंतु मैं यह सोचता हूं कि हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह होगा कि हम शंकर अथवा बुद्ध के वचनों को दोहराने के बदले स्वयं ही इस बारे में पता लगाएं |

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यदि संभव हो


यदि संभव हो, तो इस शाम मैं ध्यान के बारे में चर्चा करना चाहूँगा | मैं इस बारे में बात करना चाहूँगा क्योंकि मुझे लगता है कि यह विषय जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है |

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