J. Krishnamurti's Teachings Online in Indian Languages (Hindi, Punjabi, Gujarati, Marathi, Bengali etc.)







तो हमें करना क्या होगा?


मेरे विचार में कर्म की समस्या से हमारा गहरा सरोकार आवश्यक है | जब इतनी सारी समस्याएं हमारे सामने हैं--गरीबी, अधिक जनसंख्या, यंत्रों का असाधारण विकास, औद्योगीकरण, आतंरिक तथा बाह्य रूप से गिरावट का एहसास--तो हमें करना क्या होगा?

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To Think We Own a Human Being Makes Us Feel Important


Jealousy is one of the ways of holding the man or the woman, is it not? The more we are jealous, the greater the feeling of possession. To possess something makes us happy; to call something, even a dog, exclusively our own makes us feel warm and comfortable. To be exclusive in our possession gives us assurance and certainty to ourselves. To own something makes us important; it is this importance we cling to.

यह सोचना की मैं किसी का स्वामी हूँ, हमें महत्त्वपूर्ण होने का एहसास देता है


ईर्ष्या किसी पुरुष या किसी स्त्री को अपने स्वामित्व में बनाये रखने का एक ढंग है | हम जितने अधिक ईर्ष्यालु होंगे, हमारा स्वामित्वभाव उतना ही प्रबल होगा | अपने स्वामित्व में किसी को रखने से हमें ख़ुशी मिलती है, किसी पर, यहाँ तक की कुत्ते पर भी, अपना एकाधिकार जताना हमें भला और सुखद लगता है | उस पर अपना एकमेव स्वामित्व हमें सुनिश्चितता और आत्मविश्वास से भर देता है | किसी का स्वामी होना हमें महत्त्वपूर्ण बना देता है और यह महत्वपूर्ण होना ही है जिससे हम चिपके रहते है |

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Order


Order is necessary in our everyday activity; order in our action and order in our relationship with each other. One has to understand that the very quality of order is totally different from that of discipline. Order comes through directly learning about ourselves - not according to some philosopher or some psychologist. We discover order for ourselves when we are free from all sense of compulsion, from all sense of determined effort to obtain order along a particular path. That order comes very naturally. In that order there is righteousness.

व्यवस्था


हमारे प्रतिदिन के क्रियाकलाप में व्यवस्था का होना अत्यावश्यक है | साथ ही साथ हमारे एक दुसरे के प्रति संबंध में भी व्यवस्था होनी चाहिए | यह समझना ज़रुरी है कि व्यवस्था का गुणधर्म ही अनुशासन के निहितार्थ से एकदम अलग होता है | व्यवस्था आती है अपने बारे में प्रत्यक्ष रूप से सीखने के परिणामस्वरूप-- किसी दार्शनिक या किसी मनोवैज्ञानिक के अनुसार सीखने से नहीं | दबाव के किसी भी भाव से जब हम मुक्त होते हैं, किसी विशिष्ट मार्ग से व्यवस्था उपलब्ध करने के दृढ़ प्रयास के भाव से मुक्त होते हैं, तब हमें अपने आप व्यवस्था का पता चल जाता है | वह व्यवस्था स्वतः ही, सहज ही आ जाती है | उसी व्यवस्था में सही होना संभव होता है |

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इस सबको सूत्रों और शब्दों में व्यक्त करना कितना व्यर्थ जान पड़ता है;


इस सबको सूत्रों और शब्दों में व्यक्त करना कितना व्यर्थ जान पड़ता है; चाहे जितने सही शब्द प्रयोग क्यों न किए गये हों, वर्णन कितना भी अधिक सुस्पष्ट क्यों न हो, इस सबके माध्यम से वास्तविक तथ्य संप्रेषित नहीं हो पाता |

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Fear


I would like to talk this morning on a topic which may be rather difficult, but we will try and make it as simple and direct as possible.

भय


आज की सुबह में एक ऐसी चर्चा करना चाहूंगा जो हो सकता है थोड़ी कठिन जान पड़े पर हम उसे समझने की कोशिश करेंगे, यथासंभव सरल रूप में और स्पष्टतापूर्वक |

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